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सिमरिया का होगा जल्द विकास, कार्य योजना तैयार, ग्राउंड जीरो पर पहुंचे नीतीश कुमार ।

सिमरिया का होगा जल्द विकास, कार्य योजना तैयार, ग्राउंड जीरो पर पहुंचे नीतीश कुमार ।



पौराणिक काल में राजा जनक की तपस्थली रहे मिथिला के दक्षिणी द्वार तथा मिथिला एवं मगध का संगम स्थल सिमरिया गंगा धाम अब राष्ट्रीय फलक पर छाकर अध्यात्म और मोक्ष की स्थल ही नहीं, पर्यटक स्थल के रूप में भी गुलजार हो जाएगा।


आजादी के बाद प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के प्रयास से जिस जगह पर भारत का सबसे पहला रेल-सह-सड़क पुल बना था, वह जगह हरिद्वार वाले हर की पौड़ी और अयोध्या के राम की पौड़ी की तरह, मिथिला में जानकी पौड़ी की तरह विकसित होगा। इसकी संभावना मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अचानक निरीक्षण से बढ़ गई है।


मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सिमरिया के विकास के लिए तैयार किए गए जिस ब्लू प्रिंट का गहन अध्ययन कर कार्यक्रम का खाका खींचा है, यह निश्चित रूप से एक नई आशा का संचार कर रहा है। मुख्यमंत्री ने सिमरिया गंगा धाम में पूर्व से स्थित पुल के दोनों ओर बन रहे सिक्स लेन पुल एवं रेल पुल को केंद्र बिंदु में रखते हुए स्नान घाट से श्मशान घाट तक व्यवस्था बनाने की जो तैयारी की है।



यह तैयारी जब मूर्त रूप लेगा तो बिहार और देश के विभिन्न राज्यों ही नहीं, विदेश का भी ध्यान अपनी ओर खींचेगा। यहां 28 बिंदुओं पर कार्य की जो योजना बनाई गई है, इस योजना को स्वीकृति देकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आध्यात्म और मोक्ष की इस पावन भूमि को ना केवल नई ऊंचाई देने का प्रयास किया है। बल्कि भाजपा के गढ़ मिथिला के मतदाताओं को भी विकास के अपने नए सोच का संदेश दिया है।


सिमरिया में एक ओर कार्तिक महीने में सदियों से एक महीने का कार्तिक कल्पवास मेला लगता है तो साल के 365 दिन यहां बिहार एवं देश के विभिन्न राज्यों और पड़ोसी देश नेपाल के लोग आते रहते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार जब दो-दो नया आधुनिक तकनीक का पुल बनवा रही है तो पुल के नीचे स्नान घाट, सीढ़ी, पार्क, धर्मशाला, आरती स्थल, मंदिर आदि जब बनकर तैयार हो जाएगा तो इससे संतों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों द्वारा लंबे समय से जानकी पौड़ी के रूप में विकसित करने का सपना भी साकार हो जाएगा।



मुख्यमंत्री के कार्यक्रम के दूसरे पहलू पर गौर करें तो सिमरिया बिहार में खास कर मिथिला और आसपास के राज्यों के लोगों सनातन धर्मावलंबियों के आस्था का प्रमुख केंद्र बिंदु है। 2023 में यहां लगने वाले अर्धकुंभ से ठीक पहले मुख्यमंत्री आए हैं तो यह कहीं ना कहीं हिंदू वोट बैंक को साधने की भी एक कोशिश है। नीतीश कुमार अपने प्रधानमंत्री बनने की आकांक्षा की पूर्ति के लिए भाजपा की तरह मंदिर और धर्मस्थल के विकास के मार्ग से ही जनता में पैठ बनाना चाह रहे हैं। जो प्रयास ममता बनर्जी और राहुल गांधी करते रहते हैं।


उल्लेखनीय है कि कभी अंगुत्तराप और स्वर्ण भूमि के नाम से विख्यात बेगूसराय के सिमरिया का इतिहास पौराणिक रहा है। कहा जाता है कि राजा परीक्षित को भी श्राप से उद्धार के लिए सिमरिया गंगा तट पर कल्पवास करना पड़ा था। नंदिनी सीता जब विवाह के बाद अपने ससुराल अयोध्या जा रही थी तो उनके पांव पखारने के लिए राजा जनक ने मिथिला की सीमा सिमरिया में ही डोली रखने को कहा था।


तब राजा जनक ने सिमरिया पहुंचकर गंगा के किनारे यज्ञ और कार्तिक मास में कल्पवास किया था, तभी से यहां कल्पवास की परंपरा चल रही है। आजादी के बाद देश में गंगा नदी पर सबसे पहला रेल-सह-सड़क पुल सिमरिया में बना तो लोगों की पहुंच आसान हो गई तथा बिहार ही नहीं, कई राज्य और नेपाल से लोग पहुंचने लगे। सरकार को सिमरिया घाट से सात करोड़ से अधिक का राजस्व मिलता है।


लेकिन विकास के नाम पर इसे शून्य कर दिया गया है। सिमरिया को विकसित कर जानकी पौड़ी के रूप में स्थापित करने के लिए सिद्धाश्रम के संस्थापक स्वामी चिदात्मन जी के नेतृत्व में अभियान शुरू किया गया। इसके बाद जिले के तमाम जनप्रतिनिधियों ने एकजुट होकर सिमरिया को उसकी ख्याति और गरिमा के अनुरूप अंतरराष्ट्रीय स्तर के पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करने का प्रयास शुरू किया गया।

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